Thursday, 4 June 2020

अमेरिका और लोकतन्त्र



सुबह के साढ़े पाँच चुके है। सूर्योदय तो नहीं हुआ है किन्तु कुछ उजाला प्रवेश कर चुका है। वातावरण में चारो ओर कोहरा छाया हुआ है। मै अपने बिस्तर पर ही रजाई शरीर पर लपेटे बैठा हूँ। खिड़की से घर के सामने स्थित गाछी से बांस की फुनगियां और शीशम के वृक्ष कोहरे की वजह से धुंधले नज़र आ रहें हैं और ऐसे शांत प्रतीत हो रहे है जैसे से किसी अति-गंभीर एवं शोचनीय विषय पर चिंतनमग्न हों। गाँव के बिलकुल पश्चिम में स्थित मठ से बज रहे एक भजन की मधुर ध्वनि जैसे कानों में अमृत की बूंद डाल रही हो- सुमिरन कर ले रे मना ..................................। 
कितना सात्विक और मन को शांति देने वाला है यह समय! शायद इसीलिए इसे ब्रम्ह-मुहूर्त कहते है।
अब वातावरण कुछ साफ हो चुका है। पूरब से लालिमा ने लाल किरणों के रथ पर आरूढ़ दिन के सम्राट सूर्य के आने की सूचना भी दे दी है। नाइट ड्यूटि पर लगे सभी तारे और उनके सुपरवाइजर चाँद अपने-अपने घरों को लौट चुके हैं। तभी गाछी की तरफ से अचानक से एक शोर उठता है। सभी पक्षियों ने अपने घोंसले छोडकर आपस में कुछ चर्चा करते हुए एक ही दिशा में प्रस्थान कर दिया है। ऐसा लगता है मानो ढाका हाई स्कूल के मैदान में उनके अपने जाति के किसी नेता का भाषण होने वाला है। शायद चर्चा भी इसी विषय पर कर रहे है कि आगामी चुनाव में किसे वोट दिया जाना चाहिए। जहां कुछ बुजुर्ग पक्षियाँ इस राजनीतिक बहस में व्यस्त है वहीं नन्ही पक्षियाँ कुछ ज्यादा ही उत्सुक नजर आ रही है – कहीं हेलीकाप्टर देखने के लिए तो नहीं? कितना सुंदर प्रकृति का ये चित्र है। अरे ये क्या? ये मेरे मस्तिस्क में ये कैसी हलचल होने लगी है। ये कैसे प्रश्न मेरे दिमाग में कौंधने लगे है? क्या बकवास है! ये बिलकुल ही अप्रासंगिक है। ऐसा भी कोई सोच सकता है? इस ब्रह्म-मुहूर्त की पवित्र बेला में ये कैसे अजीब से प्रश्न उठ रहे है? ऐसा क्यों हो रहा है? मैं इन प्रश्नों से जितना ही हटने का प्रयास कर रहा हूँ ये उतने ही हठी होते जा रहे है, बिलकुल पीछे पड़ गए है। ये पीछे पड़ गए है या फिर मैं ही इन प्रश्नों में दिलचस्पी लेने लगा हूँ? जी हाँ, मैं ही दिलचस्पी ले रहा हूँ। इन प्रश्नों का उत्तर मैं कहाँ ढूँढू ? न मैं यक्ष हूँ, ना ही मेरे सम्मुख कोई यूद्धिस्ठीर उपस्थित है। तो ये प्रश्न मैंने अपनी ही अंतरात्मा से पूछ बैठता हूँ कि:
अगर कभी पक्षियों को मतदान करने का मौका मिले तो क्या वे भी जाति, धर्म, संप्रदाय, वर्ग इत्यादि के आधार पर ही मतदान करेंगे?
गोली की रफ्तार से जवाब आया – तो इसमे आश्चर्य क्या है? डिग्रियों का पुलिंदा हाथ में लेकर चलने वाले मनुष्य जो शिक्षित, सभ्य और विवेकी होने का दंभ भरते है, भी उम्मीदवारों के सभी गुणों और अवगुणों को दर-किनार कर इन्हीं आधारों पर मतदान करते है तो पक्षियों से क्या उम्मीद रखे, उनके लिए तो उनकी सरकार ने प्राथमिक शिक्षा की भी व्यवस्था नहीं की है।
क्या? प्राथमिक शिक्षा की भी व्यवस्था नहीं की है?लेकिन शिक्षा, स्वस्थ्य, रोजगार सृजन, गरीबी उन्मूलन इत्यादि तो किसी भी सरकार की प्रथम प्राथमिकताऐं होतीं है, तो इस पर अभी तक ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
शायद इसीलिए कि पक्षियों की सरकार लोकतान्त्रिक नहीं है।
लोकतान्त्रिक नहीं है? तो अमेरिका के नज़रों से बची कैसे है? क्योंकि अमेरिका ने तो दुनियाँ में जहां कहीं भी लोकतन्त्र नहीं है वहाँ लोकतन्त्र की स्थापना का ठेका ले रखा है। फिर CIA से इतनी बड़ी चूक कैसे हो गयी?
शायद अभी तक किसी पक्षी ने उसके सिर पर चोंच नहीं मारी होगी?
क्यों? चोंच मारने से क्या होगा?
अगले ही दिन अमेरिकी विदेश मंत्रालय से इन्हें निर्देश दिया जाएगा कि वे अपने साम्राज्य में लोकतन्त्र की स्थापना करें। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक एजेंसी को पक्षियों के रहने सहने के तौर तरीकों की जांच का उत्तरदायित्व सौंप दिया जाएगा। यह एजेंसी तो कुछ ख़ामी नहीं ढूंढ पाएगी, किन्तु इटली की एक गुप्तचर एजेंसी संयुक्त राष्ट्र संघ को अपना प्रतिवेदन अमेरिकी सरकार के माध्यम से सौंपेगी जिसमे यह कहा जाएगा कि:
“इन पक्षियों के साम्राज्य में लोकतन्त्र की स्थापना न होने के बहुत बुरे तथा घातक परिणाम सामने आ रहे हैं। पर्यावरण में भारी असंतुलन पैदा हुआ है, ग्लोबल वार्मिंग की समस्या के लिए भी ये हीं जिम्मेदार है। सुनामी से, कैटरीना, रीटा और विल्मा जैसी समुद्री तूफानों से, विनाशकरी भूकंपों से, ज्वालामुखी विस्फोटों से मनुष्य समुदाय की रक्षा तब तक नहीं की जा सकती जब तक पर्यावरण में पुनः संतुलन की स्थापना न हो जाए। और यह तब तक नहीं हो सकता जब तक कि इन पक्षियों के साम्राज्य में लोकतन्त्र की स्थापना न हो जाए। चुकि इन पक्षियों के अलोकतांत्रिक रवैये से उत्पन्न “वर्ड फ्लू” जैसी बीमारियों ने तो सम्पूर्ण मानव जाती के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है – अतः इन पक्षियों को “सामूहिक विनाश के हथियार” (Weapons of Mass Destruction) के श्रेणी में वर्गीकृत करके संयुक्त राष्ट्र संघ को इस संबंध में उपयुक्त कदम उठाने चाहिए।“

बस इस रिपोर्ट के आते ही सुरक्षा परिषद के फैसले और अंतराष्ट्रीय सम्मति का इंतज़ार किए बिना NATO की फौज आगे बढ़ेगी और पर्यावरण की रक्षा के लिए एवं लोकतन्त्र की स्थापना के लिए पक्षियों के साम्राज्य में जल, थल और वायु मार्ग से वह सब कुछ कर दिखाएगी जो इन्होंने इराक और अफगानिस्तान में किया था।  
पर्यावणविद अपने अध्ययन, शोधों और अनुभवों का रोना रोते रह जाएंगे। अंतराष्ट्रीय समुदाय मुकदर्शक बना रहेगा और संयुक्त राष्ट्र संघ बार बार सिर्फ यही कहता रहेगा कि “हमे तो अपने जांच में कुछ भी नहीं मिला।“